जाने गर्भावस्था के दौरान होने वाले इन्फेक्शन के बारे में- PREGNANCY INFECTION

PREGNANCY INFECTION

PREGNANCY INFECTION-

प्रेगनेंसी में इन्फेक्शन हो जाए तो मिसकैरेज , बच्चे में जन्मजात दोष के खतरे बढ़ जाते हैं । इसी कारण बच्चा कोख में खत्म हो सकता है , डिलीवरी समय से पहले हो सकती है , वक्त से पहले पानी की थैली फट सकती है । प्रेगनेंसी के समय 2 तरह के इन्फेक्शन होते हैं – पहला , वायरल और दूसरा बैक्टीरियल इन्फेक्शन ।

और आज के हमारे इस ब्लॉग में हम इसी बारे में बात करने वाले है की किस तरह के इन्फेक्शन (pregnancy infection) आप को गर्भावस्था में हो सकते है और किस तरह से आप उनसे खुद को बचा सकती है इसके साथ ही ऐसा कुछ होने पर किस तरह के कदम उठाये, तो चलिए फिर जानते है इन इन्फेक्शन के नाम और उनसे जुडी कुछ बातें|

Pregnancy Mein Hone Wale Kuch Infection-

pregnancy in hindi

रुबैला/Rubella Infection-

गर्भावस्था में सबसे खतरनाक इन्फेक्शन रुबैला । अगर महिला को जीवन में पहले कभी रुबैला हो चुका है , तो यह दोबारा नहीं होगा । उसे प्रेगनेंसी में । भी इसका खतरा नहीं होगा । इसके होने पर बुखार , रैशेज , जोड़ों में दर्द , खांसी – जुकाम की समस्या हो जाती है । यह गर्भस्थ शिशु की आंखों , कानों , दिल और दिमाग के लिए खतरनाक है । बच्चा मंदबुद्धि , आंखों के कैटरेक्ट , रेटिना में समस्या के साथ जन्म लेता है । उसमें बहरापन जन्मजात हो सकता है । कई बार यह इतना हल्का होता है कि इससे मां के प्रभावित होने का पता ही नहीं चलता । इसीलिए जब कभी प्रेगनेंट महिला स्त्री रोग विशेषज्ञ से हल्के बुखार की शिकायत करती है , तो वे उसका टॉर्च टेस्ट कराते हैं ।

इस टेस्ट के जरिए ना केवल रुबैला , बल्कि साइटोमेगलोवायरस , एचआईवी , हरपीज जैसे इन्फेक्शन की जांच भी हो जाती है । पहले 3 महीनों में रुबैला होने पर गर्भस्थ शिशु 100 प्रतिशत इससे प्रभावित होगा , इसलिए प्रेगनेंसी का टर्मिनेशन जरूरी हो जाता है । तीसरे चौथे महीने में रुबैला होने पर बच्चे पर 15 प्रतिशत दुष्प्रभाव की आशंका रहती है , चौथे महीने के बाद रुबैला होने पर बच्चे को इन्फेक्शन की आशंका कम हो जाती है । इससे बचाव का उपाय है वैक्सीनेशन। लेकिन वैक्सीनेशन के 3 महीने बाद तक प्रेगनेंसी नहीं होनी चाहिए ।

प्रेगनेंसी में कैसे कपड़े पहनने चाहिए- What To Wear During Pregnancy

डिलीवरी के बाद पेट कैसे कम करें – How To Reduce Tummy After Pregnancy in Hindi

अनचाही प्रेगनेंसी की परेशानी से बचने के लिए सुझाव – Unwanted Pregnancy Medicine

डेंगू / मलेरिया-

प्रेगनेंसी में डेंगू – मलेरिया होने से नुकसान हो सकता है । डेंगू होने से प्रेगनेंट महिला का प्लेटलेट्स काउंट कम हो जाता है , जिससे हो सकता है गर्भ में । बच्चे का विकास आगे चल कर ठीक से ना हो पाए । इसके अलावा डेंगू – मलेरिया में मां को तेज बुखार के कारण प्रीमैच्योर डिलीवरी के अलावा बच्चे में कोई जटिलता आ सकती है । उसे एनआईसीयू में रखना पड़ सकता है । प्रेगनेंसी में हाई फीवर नहीं होना चाहिए , यह बच्चे के लिए खतरनाक है ।

फ्लू/Pregnancy Flu-

प्रेगनेंट महिला को फ्लू होने या इसके निमोनिया में बदल जाने पर अस्पताल में भरती कराना पड़ सकता है , क्योंकि इससे गर्भस्थ शिशु की जान जा सकती है । एबॉर्शन हो सकता है , वह जन्मजात दोष के साथ पैदा होता है । यदि महिला गर्भावस्था में फ्लू से संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आ जाए , तो डॉक्टर को जरूर बताए । इसमें खांसी , जुकाम , थकान , बुखार , शरीर दर्द की शिकायत हो जाती है । गर्भवती महिला नियमित रूप से हाथ धोने , स्वस्थ भोजन करने की आदत तो डाले ही , फ्लू से प्रभावित लोगों से भी दूर रहे । उसे फ्लू शॉट यानी फ्लू से बचाव का टीका कभी भी लगाया जा सकता है । इससे गर्भस्थ शिशु को भी लाभ होता है ।

यूटीआई/UTI Infection-

यह समस्या आमतौर पर प्रेग्नेंट महिलाओ को हो जाती है । यह इन्फेक्शन यूरिनरी ट्रैक में होनेवाले बदलावों के कारण होता है । प्रेगनेंसी में यूटरस का आकार बढ़ने से ब्लैडर पर दबाव पड़ता है और इस वजह से भी इन्फेक्शन होता है । इसमें यूरिन के समय जलन व दर्द महसूस होता है , बार – बार यूरिन के लिए जाने की जरूरत महसूस होती है । पेट के निचले हिस्से में दर्द होता है । बैक्टीरिया होने से यूरिन बदबूदार व हल्का बुखार हो सकता है । मितली व उल्टियां भी हो सकती हैं । प्रेगनेंट महिला को अपनी पटी व वेजाइनल एरिया की साफ – सफाई का खास ख्याल रखना चाहिए । इससे प्रभावित प्रेगनेंट महिला खूब पानी पिए यूरिन रोके नहीं । वह जितनी बार यूरिन जाएगी बैक्टीरिया बाहर निकलेंगे । इसके अलावा नारियल पानी , ग्लूकोज व जूस जैसी चीजें सादवा डॉक्टर की सलाह पर ही लें । उनके द्वारा बताया गया दवाओं का पूरा कोर्स करें ।

फंगल इन्फक्शन/Fungal Infection-

वेजाइना इन्फेक्शन को ही फंगल इन्फेक्शन कहते है । इसमें वेजाइना में सूजन , खुजली , जलन , लाली और सफेद डिस्चार्ज की समस्या हो जाती है । सबसे पहले अपनी डॉक्टर को दिखा लें । वे आपको ऐसी दवा बताएंगे , जो गर्भस्थ शिशु पर दुष्प्रभाव नहीं डालेगी । उनका बताया दवाओं का पूरा कोर्स करें , बीच में ना छोड़ें , वरना इन्फेक्शन फिर पनप सकता । है । डॉक्टर दवाओं के अलावा रात में संक्रमित हिस्से में लगाने को क्रीम प्रेस्क्राइब कर सकते हैं । इससे तुरंत आराम मिलेगा ।

वेजाइनल यीस्ट इन्फेक्शन/Vaginal Yeast Infection-

जब वेजाइना में अच्छे बैक्टीरिया की मात्रा कम होती है तो कैंडिडा यानी यीस्ट की मात्रा बढ़ने से यह इन्फेक्शन होता है । इसे कैंडिडासिस भी कहते है । इसमें वेजाइना में खुजली , दर्द होता है और क्रीमी । डिस्चार्ज होता है । यह प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही में होता है । इसका अजन्मे बच्चे पर कोई खास बुरा असर नहीं होता , लेकिन महिला को परेशानी रहती है ।

डॉक्टर को दिखाने और उनकी दवाएं नियमित पस कुछ दिन लेने पर यह ठीक हो जाता है । यह इस्ट्रोजन का लेवल बढ़ने की वजह सह कदौरान सेक्स करने से भी हो सकता हा चाटक चीजें लेने से बैक्टीरिया कंट्रोल में आ जाते हैं । प्रेगनेंट महिलाएं जेनाइटल एरिया को सूखा रखें । पैंटी बदलती रहें । सेंटेड साबुन और स्प्रे का इस दौरान प्रयोग ना करें । नहाने के बाद खुद को अच्छी तरह सुखा कर अंडरगारमेंट्स पहनें ।

बैक्टीरियल वेजिनोसिस-

बैक्टीरियल वेजिनोसिस यानी बीवी वेजाइना इन्फेक्शन । इसमें वेजाइना में दर्द , जलन व खुजली होती है । इसमें वेजाइना से बदबू आती है । इसमें पतला , ग्रे रंग का डिस्चार्ज होता है । इसका समय से इलाज ना कराने पर समय से पहले बच्चे का जन्म हो सकता है और बच्चे का जन्म के समय वजन कम होता है । इसलिए डॉक्टर को दिखाएं , वे जो उपचार बताएं पूरा करें , खूब पानी पिएं व हेल्दी डाइट लें ।

जीबीएस इन्फेक्शन/GBS Infection-

यह इन्फेक्शन ग्रुप बी स्ट्रेपटोकोकस बैक्टीरिया की वजह से होता है । यह बैक्टीरिया रेक्टम यानी मलाशय में होता है , लेकिन वेजाइना पास होने से वहां पहुंच जाता है । जीबीएस से बर्थ के दौरान बेबी को संक्रमण हो सकता है , जो बच्चे के लिए घातक हो सकता है । इसका इलाज महिला को एंटीबायोटिक दे कर किया जाता है । डॉक्टर ऐसे एंटीबायोटिक बताएंगे , जो महिला और गर्भस्थ शिशु के लिए नुकसानदायक ना हों ।

साइटोमेगालोवायरस-

यह लार , यूरिन , खून , सीमेन के जरिए फैलता है । गर्भवती महिला को सेक्स के दौरान यह संक्रमण हो सकता है , जिससे गर्भ में पल रहा शिशु ब्लाइंडनेस या बहरेपन का शिकार हो सकता खांसने – छींकने से भी यह इन्फेक्शन गर्भवती महिला को हो जाता है । इससे बच्चे की पूरी ग्रोथ पर असर पड़ता है । निमोनिया , जॉन्डिस के साथ जन्म । ले सकता है । लिवर बढ़ा हुआ व बच्चा मंदबुद्धि हो सकता है । इसका कोई इलाज नहीं है , कोई वैक्सीनेशन नहीं है । अगर मां पर इस इन्फेक्शन का ज्यादा दुष्प्रभाव हो रखा है , तो प्रेगनेंसी टर्मिनेशन ही उपाय बचता है ।

हरपीज-

हरपीज अगर जेनाइटल है , तो नेचुरल बर्थ होने पर बच्चे को संक्रमण हो सकता है । उसे हरपीज हो सकता है । हालांकि इसका इलाज पैदा होने के बाद हो सकता है । अगर प्रेगनेंट महिला को पहले से जेनाइटल हरपीज है , तो प्रेगनेंट होते ही यह बात अपनी डॉक्टर को बताएं । वे इस बात का ध्यान रखेंगे और सबसे सुरक्षित सिजेरियन सेक्शन डिलीवरी करेगे|

लेट प्रेगनेंसी सेफ्टी/Late Pregnancy In Hindi-

pregnancy

प्रेगनेंसी को आमतौर पर डॉक्टर पर दूसरी और तीसरी तिमाही के बीच बाटते हैं । उस पर अगर लेट प्रेगनेंसी हो , तो महिला का हर तिमाही में खास चेकअप किया जाता है । खासकर 35 की उम्र के बाद प्रेगनेंट होने पर कुछ जांचों के बाद जाना जाता है कि प्रेगनेंसी को आगे बढ़ाना ठीक रहेगा या नहीं । अगर गर्भस्थ शिशु की कमी दूर नहीं हो पाए , तो एबॉर्शन की सलाह दी जाती है ।

पहली तिमाही : इसमें अल्ट्रासाउंड और मेटरनल सीरम स्क्रीनिंग टेस्ट करके फीटस की न्युकल ट्रांसलुसेंसी और नाक की हड्डी की मौजूदगी जांच करते हैं । इससे भ्रूण की पीठ के लिक्विड को जांचते व देखते हैं । ‘ कि यह अधिक तो नहीं है । डाउन सिंड्रोम होने पर फीटस की नाक की हड्डी दिखती ‘ नहीं है । यह टेस्ट प्रेगनेंसी के 11वें से 13वें ‘ हफ्ते के भीतर करके एक्टोपिक प्रेगनेंसी व ‘ एबॉर्शन के खतरे को पहले ही जांचा जा सकता है । सीवीएस की जांच 10 से 13 ‘ हफ्ते के बीच की जाती है । इसमें बच्चे के जेनेटिक डिफेक्ट का पता चलता है ।

दूसरी तिमाही : इसमें अल्ट्रासाउंड और ‘ मेटरनल सीरम स्क्रीनिंग प्रेगनेंसी के 15 – 20 हफ्ते के बीच करते है । इसमें कई मार्कर ‘ स्क्रीनिंग होती है । एएफपी यानी अल्फा फीटोप्रोटीन का स्तर असामान्य होने पर ‘ एब्डॉमिनल वॉल डिफेक्ट डाउन सिंड्रोम , ‘ क्रोमोजोमल एब्जॉर्मिलिटी पकड़ी जाती है । । ‘ पंद्रह से 20 हफ्ते के अंदर एमिनोसेटसिस ‘ टेस्ट करके जेनिटकल डिफेक्ट का पता किया जाता है । इसके सेंपल से एएफपी को ‘ सीधे आंका कर ओपन न्युरल ट्यब डिफेक्ट का पता चलता है ।

तीसरी तिमाही : फीटल ग्रोथ स्कैन टेस्ट प्रेगनेंसी के 28 से 32 हफ्ते के बीच किया जाता है । यह एक अल्ट्रासाउंड डॉप्लर स्कैन टेस्ट है , जिसके जरिए फीटस की । ‘ पोजिशन , उसके विकास , नाभि व रीढ़ की हड्डी की पोजिशन जानी जाती है । यह एक ‘ बायोफिजिकल प्रोफाइल टेस्ट है । इसके ‘ साथ ही ओरल ग्लुकोज टॉलरेंस टेस्ट 24 से 28 हफ्ते के भीतर किया जाता है । इससे ‘ मां में रलकोज को एब्जॉब करने की क्षमता का पता चलता है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *