सुख-समृद्धि के लिए दीपावली में करे इन चीजों का दान

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दिवाली अपने साथ उत्साह, खुशियां और नयी आशाएं ले कर आती है| हर घर – आंगन , मोहल्ले , खेत – खलिहान और बाजार के घंटाघर से बड़े – बड़े मॉल्स तक सभी रंग बिरंगे रोशनियों से जगमगा उठते है| रंग रंगोली से घर का कोना – कोना जगमगाने लगता है। बाजार में मिट्टी के दीए, सकोरे, खील – बताशों और मिठाई की दुकानों के आगे लंबी – लंबी लाइनें नजर आती हैं।

व्यापारी तो इसी दिन से अपने बहीखाते के नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत भी करते हैं । हफ्तेभर पहले से पटाखों और फुलझड़ियों की गूंज , रंगबिरंगी रोशनी घर – घर से फूटती नजर आती है।

धनतेरस दान:

दीवाली अपने आप में कई दूसरे पर्व समेटे हुए कदम रखती है । दीपावली से 2 दिन पहले धनतेरस का त्योहार आता है । बरतनों से सजी दुकानों की चमक – दमक बाजार की चहल – पहल बढ़ जाती है । इस दिन बरतन और गहना खरीदना शुभ मानते हैं । इस दिन तुलसी चौरा और मुख्य द्वार पर दीए जलाए जाते हैं , जिससे रोग व अकाल मृत्यु का भय टलता है ।

धनवंतरी का संबंध स्वास्थ्य से होता है । इस दिन दवाइयां दान करने का भी महत्व है । यह सेहत के नाम पर दिया गया दान है । बरतन खरीदने के साथ घर में काम करनेवालों को बरतन देने का विशेष महत्व है । वैसे एक पौराणिक कहानी के अनुसार , राजा हिम को अपने बेटे की जन्मपत्री दिखाने पर पता चला कि उनके बेटे की 16 वर्ष की आयु में शादी के चौथे दिन सांप के काटने से मौत हो जाएगी ।

dhanteras puja

जब वह दिन आया , तो नवविवाहिता पत्नी ने अपने गहनों , सोने – चांदी के सिक्कों का ढेर अपने कमरे की दहलीज पर लगा कर बहुत सारे दीए जला दिए । अपने पति को जगाए रखने के लिए वह रातभा गीत गाती और उसे कहानी सुनाती रही । जब यमराज सांप के भेष में राजकुमार को डसने पहुंचे , तो गहनों और दीपों की चकाचौंध में उनको कुछ नजर नहीं आया । वे सोने – चांदी के सिक्कों के ढेर के ऊपर चढ़ गए बैठ गए , पर तेज रोशनी से कुछ भी देखने में असमर्थ थे ।

वे उस पर बैठे पूरी रात कहानियां और गीत सुनते रहे । भोर होते ही चुपचाप वापस चले गए , क्योंकि मौत की घड़ी बीत चुकी थी । वह दिन धनतेरस कहलाया।

रूप चौदस दान/नरक चतुर्दशी:

धनतेरस के अगले दिन नरक चतुर्दशी या रूप चौदस का त्योहार आता है । इसे छोटी दीवाली भी कहते हैं । रूप चौदस की सुबह उबटन लगाने की परंपरा है । पुराणों के अनुसार भगवान कृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि पर नरकासुर नामक असुर का वध किया था। एक अन्य मान्यता यह भी है कि नरक चतुर्दशी के दिन सुबह स्नान करके यमराम का पूजन और शाम के समय दीप दान करने से नर्क की यातनाओं और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता ।

इस दिन घर की पश्चिम – दक्षिण दिशा के चारों कोनों पर चार बत्तियोंवाले , सरसों के तेल से भर दीयों को पांच तरह के अनाज के ऊपर रखते हैं । इससे घर धन – धान्य से पूर्ण होता है । शाम को धन के देवता कुबेर व यमराज के लिए दीपदान करने से धन – समृद्धि के साथ परिवार में खुशहाली व रूप में वृद्धि होती है । इसे यम दीपदान भी कहते हैं ।

महापर्व दीपावली दान:

दीपावली के दिन सूर्योदय के समय पूरा परिवार नहा – धो कर घर के पूजाघर के देवताओं का पूजन साथ मिल कर करता है । प्रसाद में खोए की मिठाई या मिसरी – बताशे का भोग लगा कर मुख्य द्वार पर रंगोली बनाते हैं । लक्ष्मी के स्वागत में कार्तिक अमावस की शाम से घर – घर में दीपों की पंक्तियां प्रज्वलित की जाती हैं , जिससे कोना – कोना रोशनी से भर उठता है ।

लक्ष्मी – गणेश की मूर्तियों के आगे देसी घी और सरसों के दीए रातभर जला कर लोग सुख – समृद्धि की कामना करते हैं । गणेश , विष्णु , महालक्ष्मी और देवताओं के नाम से अधिक से अधिक दीए जलाएं । कम से कम 11 दीए तो अवश्य ही जलाएं । आसपास के घरों व घर में काम करनेवालों को खील – मिठाइयां – बताशे व चीनी के खिलौने भेंट करें ।

दीपावली गोवर्धन पूजा/गोवर्धन पूजन का दान:

कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा व अन्नकूट पर्व मनाते हैं । गोवर्धन पूजा में गोधन यानी इस दिन गाय – बैल की पूजा करने के साथ विश्वकर्मा के नाम से दीपदान करने से घर में टूटफूट का डर नहीं रहता । शास्त्रों में गाय को गंगा नदी के । समान पवित्र माना जाता है । गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है । यानी जिस तरह देवी लक्ष्मी सुख – समृद्धि प्रदान करती हैं , उसी प्रकार गाय सुख – समृद्धि और स्वास्थ्य प्रदान करती है ।

उसका बछड़ा बड़ा हो कर बैल के रूप में खेतों को जोत कर अनाज उगाने में मदद करता है । इस दिन गाय – बैल को स्नान करा कर , उनके माथे पर गेरू लगाते हैं और गुड़ पके भात को बड़े – बड़े लड्डुओं का आकार दे कर खिलाते हैं । उनके गले में नयी रस्सी डालते हैं । दरअसल गाय गोवर्धन का प्रतीक रूप है । कृष्ण ने 7 दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा कर संपूर्ण गोकुलवासियों की इंद्र के कोप से रक्षा की थी ।

इस दिन इंद्र का अभिमान श्रीकृष्ण ने चूर किया था और इंद्र ने उनसे क्षमा मांगी थी । सात दिनों बाद कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत नीचे रखा और गोप – गोपियों से हर वर्ष गोवर्धन पूजा और अन्नकूट पर्व मानने को कहा । अन्नकूट के दिन भोजन के आदान – प्रदान का बहुत महत्व है । पूजा के बाद अपने परिवारवालों , निकट संबंधियों व पड़ोस में प्रसाद भिजवाएं ।

भाईदूज : नदी तीरे दीपदान भैयादूज:

भैयादूज के दिन यमुना नदी के किनारे दीप जलाने का खास महत्व है । प्रतीक रूप में किसी भी नदी के किनारे दीए जला सकते हैं । इसकी भी एक कहानी है । भाईदूज को यम द्वितीया कहते हैं । इस दिन बहनें भाई के दीर्घ जीवन की कामना करती हैं । पुराणों की कथाओं के अनुसार , यमुना और यमराज भाई – बहन हैं ।

एक बार यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया । यमराज के अति व्यस्त होने के कारण बहन के घर उनका आना टलता जा रहा था । एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमुना ने अपने द्वार पर भाई यमराज को खड़े पाया । वह हर्ष विभोर हो गयी । भाई । का खूब आदर – सत्कार और आवभगत की ।

उनको भोजन कराया । यमराज बहन के निश्छल प्रेम से अति प्रसन्न हुए और कुछ मांगने को कहा । यमुना ने एक क्षण गंवाए बगैर कहा , “ आप प्रति वर्ष इसी दिन मेरे घर भोजन करने आएंगे । इस दिन जो बहन अपने भाई का टीका करके भोजन कराएगी , उसके भाई को आपका कोई भय ना रहे यानी वह दीर्घायु हो । ” यमराज ने तथास्तु कह कर यह वरदान सिर्फ अपनी बहन को ही नहीं , दुनिया की हर बहन को दिया|

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