एचआईवी और एड्स के बारे में ये जरूरी बातें | World Aids Day

world-aids-day

एचआईवी “एड्स “(ह्युमन इम्युनडिफिशिएंशी वायरस) या मानवीय प्रतिरक्षी अपूर्णता विषाणु एक विषाणु है जो शरीर की रोग-प्रतिरक्षा प्रणाली पर प्रहार करता है और संक्रमणों के प्रति उसकी प्रतिरोध क्षमता को धीरे-धीरे कम करता जाता है। यह लाइलाज बीमारी एड्स का कारण है। मुख्यतः यौण संबंध तथा रक्त के जरिए फैलने वाला यह विषाणु शरीर की श्वेत रक्त कणिकाओं का भक्षण कर लेता है। इसमें उच्च आनुवंशिक परिवर्तनशीलता का गुण है। यह विशेषता इसके उपचार में बहुत बड़ी बाधा उत्पन्न करता है।

आशा और रमेश पति – पत्नी है और दोनों ही एचआईवी – एड्स से ग्रसि हैं । रमेश का रोड एक्सीडेंट के । कारण बहुत खून बह जाने से खून चढ़ाना पड़ जो एचआईवी से संक्रमित था । जब तक बात पकड़ में आयी रमेश से उसकी पत्नी को एचआईवी संक्रमित हो चुका था । यह बात पता चलते ही उसे जॉब से निकाल दिया गया । उनके बेटे को एडमिशन देने के लिए कोई स्कूल तैयार नहीं है । उनसे पड़ोसी – रिश्तेदार सबने कन्नी काट ली । आज उनके बेटे का कोई दोस्त नहीं है । एचआईवी / एड्स के मरीजों के प्रति ऐसे सामाजिक भेदभाव को खत्म करना हिंदुस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती है ।

यहां लगभग 30 लाख एचआईवी मरीज हैं । एड्स यहां आज भी एक कलंक की तरह है । जो लोग इससे ग्रसित हैं , उनको समाज में हर जगह भेदभाव और बुरे ‘ व्यवहार का शिकार होना पड़ता है । सबसे ज्यादा असर व्यवसाय और वर्कप्लेस पर पड़ता है । यह आम धारणा है कि एड्स का मरीज अपने आसपास के लोगों को जल्दी प्रभावित करता है ।

इससे ग्रसित व्यक्ति भी यदि  एहतियात व सही इलाज कराए , तो पूरी आयु जीता है । इसलिए इस बीमारी के प्रति जागरूकता के साथ भ्रांतियों को दूर करने की जरूरत है , ताकि इससे वाकई बचाव हो सके । भारतीय संघ राज्य ने एड्स पर हुए ऐसे कई अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं , जो एचआईवी / एडस पॉजिटिव लोगों या जिनमें इसकी संभावना है , उनके अधिकारों की सुरक्षा देने की वकालत करते हैं । इनके तहत ऐसे मरीजों से भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं किया जा सकेगा ।

एचआईवी / एड्स बिल 2007 :

यह विधेयक सरकार और सिविल सोसाइटी की संयुक्त पहल का परिणाम है । यह बिल एचआईवी / एड्स के मरीजों के निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों पर । होनेवाले भेदभाव पर पूरी तरह से रोक लगाती है । इसके तहत एचआईवी / एड्स होने के आधार पर रोजगार , शिक्षा , चिकित्सा , यात्रा , इंश्योरेंस , आवास और जायदाद से संबंधित किसी भी । मामले में उनके साथ कोई भेदभाव नहीं होगा । । ‘ इसके तहत तो एचआईवी की जांच , इलाज व शोध एकदम फ्री होगा । मरीज को एड्स होने की बात गोपनीय रखी जाएगी पर उसको एड्स के संक्रमण को रोकने के उपाय अपनाने होंगे । इसमें संक्रमित महिला व युवाओं पर फोकस रखा गया है ।

जैसे एक एचआईवी ग्रसित गर्भवती महिला को अस्पताल ने एडमिट और उसका इलाज करने से ही इनकार कर दिया । दिल्ली हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि अस्पताल तुरंत महिला को इलाज करके उसकी सेहत और गर्भ की सुरक्षा करे । उसे तुरंत एक यूनिट खून मुहैया कराया जाए । बिल में इस बात का उल्लेख भी है कि यदि किसी महिला के साथ रेप हुआ है और उसकी वजह से एचआईवी संक्रमित हुआ है , तो उसका इलाज , काउंसलिंग आदि करायी जाए ।

किसी भी व्यक्ति को एचआईवी / एड्स की जांच कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता । मूल अधिकार सूचना एवं सहमति का हक : डॉक्टर पेशेंट को एचआईवी से ग्रसित होने की सूचना , उससे जुड़े खतरों और बचने के विकल्पों के बारे बताए । उसकी सहमति पर ही टेस्ट होगा । गोपनीयता का अधिकार : डॉक्टर का कर्तव्य है कि वह मरीज को एड्स होने की बात दूसरे को ना बताए । मरीज अपनी पहचान ना बताना चाहे , तो उसका नाम बदला जा सकता है ।

भेदभाव से मुक्ति का हक : उसे समानता का ‘ हक है । एड्स भेदभाव का आधार नहीं हो सकता । स्वास्थ्य का अधिकार : यह राज्य का कर्तव्य है । कि प्रत्येक नागरिक को स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं ‘ दे । कोई डॉक्टर इस आधार पर किसी रोगी की चिकित्सा करने से मना नहीं कर सकता कि उसे ने की एड्स है ।

रोजगार पाने का अधिकार :

अगर एचआईवी / एड्स होने पर भी मरीज अपना काम अच्छी तरह कर रहा है , तो उसे बर्खास्त नहीं किया जा सकता । ऐसा होने पर वह इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल , लेबर कोर्ट , सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में अपील कर सकता है या हाई कोर्ट में ब्रीच फॉर कॉन्ट्रेक्ट के तहत हुए नुकसान की भरपाई के लिए दावा कर सकता है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *